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प्रस्तावना

करीब तीन सौ पृष्ठों के इस ग्रन्थ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पारित प्रस्तावों का संग्रह है। ये सारे प्रस्ताव, एक तो अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल द्वारा पारित किये गये हैं, या अ.भा. प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित किये गये हैं। कार्यकारी मण्डल की सामान्यत: वर्ष में दो बार बैठके होती हैं, और प्रतिनिधि सभा की वर्ष में एक बार। तथापि, अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल की एक मात्र बैठक में प्रस्ताव पारित किये जाते हैं। दूसरी बैठक, प्रतिनिधि सभा से संलग्न रहती है, अत: कार्यकारी मण्डल द्वारा पारित प्रस्ताव, अंतिम मान्यता के लिये प्रतिनिधि सभा के सामने जाते है। इसलिये, यदि यह कहा जाये कि कार्यकारी मण्डल की एक और प्रतिनिधि सभा की एक ऐसे वर्ष में दो बार ही प्रस्ताव पारित होते हैं, तो कोई गलती नहीं होगी। आवश्यकता पड़ने पर सरसंघचालक या सरकार्यवाह द्वारा वक्तव्य भी प्रकाशित होते हैं।

1947 के पूर्व की स्थिति
1950 से 2006 तक के प्रस्ताव यहाँ समाविष्ट है। पहले के क्यों नहीं? संघ की स्थापना तो 1925 में हुई थी ? ऐसे प्रश्न किसी के मन में आ सकते हैं। उसका सरल कारण यह है कि, 1950 के पहले प्रस्ताव पारित नहीं होते थे। उस कालखण्ड में, स्वतंत्रता प्राप्त करना यही एक मात्र लक्ष्य था। और संघ की कार्यरचना उसी लक्ष्य को सामने रखकर की गयी थी। उस समय, जो प्रतिज्ञा स्वयंसेवक लेते थे, उसमें और आज की प्रतिज्ञा में थोड़ा अन्तर है। ''हिन्दु राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिये मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूँ'' - इस प्रकार की शब्दावली थी। अब उसके स्थान पर ''हिन्दु राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिये मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूँ''- ऐसी शब्दावली है। इस शब्दावली से ही संघ के सामने का तत्कालिक लक्ष्य क्या था ? इसका पता चलता है। यह भी सब लोग भलीभांति जानते हैं कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार बाल्यकाल से ही क्रांतिकारक प्रवृत्ति के धनी थे। डॉक्टरी पढ़ने के लिये जब वे कलकत्ता गये, तब क्रांतिकारियों के साथ उनका और घनिष्ठ सम्बन्ध आया। वे अनुशीलन समिति के अंतरंग सदस्य भी थे। क्रांतिकारियों की सब गतिविधियों का ज्ञान और तंत्र सीख कर वे नागपुर लौटे। किन्तु उनके जब यह ध्यान में आया कि जब तक क्रांतिकार्य के लिये समाज की सहानुभूति प्राप्त नहीं होगी और जब तक सामान्य जनमानस में स्वातंत्र्य की आकंक्षा उदित नहीं होगी तब तक क्रांतिकारियों का बलिदान और हौतात्म्य सफल नहीं होगा। तब उन्होंने अपने को राष्ट्रीय काँग्रेस के कार्य में स्वयं झोंक दिया। वहाँ अग्रेसर होकर कार्य करते समय, यह भी उनके ध्यान में आया कि केवल स्वतंत्रता की आकांक्षा सामान्य जनमानस में उत्पन्न होने से काम नहीं चलेगा। उस लक्ष्य को लेकर अग्रगामी कार्यकर्ताओं के एक संगठित गुट की भी आवश्यकता रहेगी। रेलगाड़ी का इंजिन जो काम करता है, वैसा काम यह नेतृत्व करेगा। इसी हेतु, उन्होंने हर शहर में तीन प्रतिशत और गांवों में एक प्रतिशत गणवेशधारी सदा सन्नद्ध तरुण स्वयंसेवक तैयार करने का लक्ष्य सामने रखा। अत: अपने कार्य का बहुत अधिक गाजावाजा वे नहीं चाहते थे। कार्य हो, उसके साथ जनता का परिचय हो, और कार्य के लक्ष्य के साथ समाज भावना जुड़ जाये, इसी हेतु से सारी रचना थी। एक घण्टे की पूर्व सूचना मिलते ही स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण हो इसका अभ्यास भी उन्होंने शुरु किया था, जो 1947 तक कार्य का एक आवश्यक भाग था। इसके कारण संघ एक गुप्त संगठन है, ऐसा प्रचार भी होता था। संघ के विरोधी बीच-बीच में इस प्रकार के अपप्रचार की रट लगाते थे। महात्मा जी की 30 जनवरी को हत्या हुई, उसके एक दिन बाद तुरंत 31 जनवरी को, नागपुर की शाखा की ओर से उनको श्रद्धांजलि अर्पण करने हेतु, जो प्रात:काल में स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण हुआ, उससे लोग चकित हुए थे और दुर्भावना से ग्रस्त लोगों ने यह भी प्रचार किया कि गांधीजी की हत्या संघ की साजिश है और यह बात संघ को ज्ञात होगी ही तभी तो इतनी सुबह हजारों का एकत्रीकरण हो सका। जिनको घण्टे-दो घण्टो की सूचना पर एकत्र आने का अभ्यास था, उनको कई घण्टे पहले सूचना मिलने पर एकत्र आना कौन सी कठिन बात थी। संघ की कार्यपद्धति से अनभिज्ञ लोग ही इस प्रकार के दुष्प्रचार से प्रभावित हुये थे। 1949 में, संघ का लिखित संविधान जब भारत सरकार को दिया गया, तब वहाँ की आजीवन प्रतिज्ञा का प्रावधान पढ़कर भारत सरकार के सचिव ने प.पू. गुरुजी को पत्र में लिखा था, कि आजीवन प्रतिज्ञा यह किसी गुप्त संगठन की विशेषता हो सकती है। इस आपत्ति को श्री गुरुजी ने करारा जवाब देकर गृह मन्त्रालय की इस टिप्पणी को खारिज किया, यह बात अलग है। किन्तु संघ के बारे में कुछ लोगों में यह धारणा थी, यह सत्य है। अत: समाज जीवन के अन्य विषयों के सम्बन्ध में कोई प्रस्ताव पारित होने का उस काल में सम्भव ही नहीं था।
15 अगस्त 1947 के बाद परिस्थिति में अन्तर आया। इस नयी परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में संपूर्ण समाज के संगठन के रूप में- न कि समाज के अन्दर एक संगठित टोली के रूप में- संघ का प्रस्तुतीकरण हुआ। अत: धीरे-धीरे इन सभी क्षेत्रों में संघ के कार्यकर्ता गये। साथ ही समाज के विभिन्न क्षेत्रों के सम्बन्ध में संघ की राय क्या है, यह बताना भी आवश्यक हो गया।
मैंने यहाँ पर संघ यह संपूर्ण समाज का संगठन है यह बात कही। इसकी पुनरुक्ति आवश्यक है। ''संपूर्ण समाज का संगठन''। समाज का ही राष्ट्र बनता है। People Are The NationA अंग्रेजी में अनेकों बार Nation के पर्याय के रूप में People शब्द आता है। संघ की प्रारंभ से ही यह मौलिक धारणा रही है कि यहाँ का हिन्दु समाज ही राष्ट्र है। वह समाज ही राष्ट्रीय है। हिन्दु शब्द का प्रयोग संघ में कभी भी विशिष्ट उपासना, पंथ या संप्रदाय के अर्थ में नहीं किया गया है। वह प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग विशेषता हो सकती है। और संघ सभी विशेषताओं को मानता है, उनका आदर करता है। ऐसे अनेक संप्रदायों, पंथों तथा विश्वासों के लिये हिन्दु राष्ट्र में स्थान है। क्योंकि हिन्दु, विविधता का सम्मान करने वाला है। संघ ने 'राष्ट्रीय' अर्थ में ही 'हिन्दु' को प्रस्तुत किया है। उस का धयेय हिन्दुओं का संगठन करने का है। लेकिन उसका नामाभिधन 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' है। संघ के लिये 'हिन्दु' और 'राष्ट्रीय' समकक्ष है।

मुख्य और आनुषंगिक
समाज जीवन के अनेक क्षेत्र होते हैं। अनेक विधायें होती हैं। राजनीति, धर्म, अर्थ, शिक्षा, किसान, मजदूर, विद्यार्थी, शिक्षक, महिलाएं, वनवासी, कितने ही क्षेत्र गिनायें जा सकते हैं। संपूर्ण समाज का संगठन यानि इन सभी क्षेत्रों का संगठन और संगठन का अर्थ है एक समान राष्ट्रीय विचार से प्रत्येक क्षेत्र का अनुप्राणित होना और उस क्षेत्र के कार्यकर्ता चरित्र संपन्न होना। संगठन शब्द में जो 'सम' यह उपसर्ग है, उसका अर्थ ही केवल एकत्रीकरण नहीं, तो संस्कारयुक्त लोगों का एकत्रीकरण। चारित्र्य की शिक्षा और तद्नुसार आचरण को प्रेरित करने वाले संस्कारों की व्यवस्था वाला एकत्रीकरण हैं। संगठन केवल गठन नहीं, सम्यक् गठन होता है। सम्यक् गठन के लिये चारित्र्य युक्त लोगों का एकत्रीकरण अनिवार्य है। इस का और एक अर्थ यह होता है कि 'राष्ट्र' सर्वोपरि है, सर्वश्रेष्ठ है, बाकी क्षेत्र, कितने भी महत्त्व के हो, वे सारे राष्ट्र के सम्बन्ध में आनुषंगिक है। अत: संघ की दोनों अधिकारिणीयों द्वारा पारित प्रस्ताव, राष्ट्रजीवन को प्रभावित करने वाले, समाज जीवन के सभी क्षेत्रों के सम्बन्ध में है। कुछ लोगों का कहना है कि संघ अपने आप को सांस्कृतिक संगठन मानता है, वैसा बताता है फिर भी राजनीतिक विषयों पर प्रस्ताव पारित करता है यह कैसे ? इन लोगों की राष्ट्र और राज्य की संकल्पनाओं के अर्थछटाओं से अनभिज्ञता हो इस प्रश्न के मूल में है। राजनीतिक विषयों पर संघ के वही प्रस्ताव है, जो राष्ट्र जीवन पर, राष्ट्रीय मुख्य धारा पर प्रभाव डालते हैं।

राष्ट्र को खतरे
संघ का मूलभूत विचार यह है कि यह राष्ट्र एक है, इसकी संस्कृति एक है और जनता एक है। ''एक देश, एक जन, एक संस्कृति, एक राष्ट्र''- यह संघ की आरम्भ से ही आधारभूत भूमिका रही है। अत: देश की अखण्डता को जब-जब भी खतरे उत्पन्न हुये, संघ ने उनकी चेतावनी देने के लिये प्रस्ताव परित किये। 15 अगस्त 1947 को जब देश का विभाजन हुआ, तब, संघ के उस समय के सरसंघचालक श्री गुरुजी ने, अपने अनेक भाषणों में, उसका कड़ा विरोध किया। विभाजन के बाद, संघ, पाकिस्तान से आये अपने हिन्दु शरणार्थियों की सेवा में, उनके पुनर्वसन में जुट गया किन्तु, पाकिस्तान बनने मात्र से देश की अखण्डता को संभाव्य खतरे कम नहीं हुये। उत्तर-पूर्व में भारत को तोड़ने के षड्यंत्र चले। इसमें ईसाई मिशनरी संस्थाओं की अहम् भूमिका रहीं। नागालैण्ड टूटते-टूटते बच गया। मिजोरम, असम राज्य का एक छोटा सा जिला आज उसकी आबादी केवल सात लाख है, जब मिजोरम को स्वतंत्र राज्य के रूप में प्रस्थापित करने का हिंसक आंदोलन प्रारंभ हुआ, तब उसकी जनसंख्या तीन लाख भी नहीं थी। मिजो नेशनल फ्रंट का निर्माण हुआ। शासन ने कठोरता से उस उग्र आंदोलन को समाप्त तो किया, लेकिन उसका अलग से एक राज्य भी बना दिया। इसके द्वारा प्रोत्साहित होकर अन्य प्रदेशों में भी हिंसक आंदोलन चले। आज भी त्रिपुरा और मणिपुर में चल रहे हैं। जनजातियों में से विशिष्ट समूहों को ईसाई बनाकर उनको बगावत के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। इस खतरे की ओर शासन और जनता का ध्यान आकर्षित करने हेतु, संघ के अनेक प्रस्ताव हैं।
मुसलमानों को पाकिस्तान का स्वतंत्र, स्वायत्त राज्य मिलने से भी उनका समाधान नहीं हुआ। पश्चिम पाकिस्तान की हिन्दु प्रजा को, पाकिस्तान से निकालने के लिये, उसी समय घोर अत्याचार किये गये। पाकिस्तान में हिन्दु आबादी का 18 प्रतिशत था। आज केवल 1 प्रतिशत है। पूर्व में जो पाकिस्तान का हिस्सा था, वहाँ से भी हिन्दुओं को भगाने का कार्यक्रम शुरू हुआ। अब वह हिस्सा पाकिस्तान का भाग नहीं है। बांगलादेश बन गया है। यह आजादी, उसको भारत की सहायता से प्राप्त हुई है। किन्तु बांगलादेश की सरकार कृतज्ञता भाव से शून्य है। वहाँ से भी हिंदुओं को भगाना चालू है। इतना ही नहीं तो उसकी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भारत में अवैध रूप से गत पचास वर्षों में घुसपैठ कर रहा है। यह सब वहाँ की सरकार की शह पर हो रहा है। असम और पश्चिम बंगाल के कई जिले मुस्लिम बहुल हो गये हैं, और कुछ होने की कगार पर है। जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हो जाता है, वह हिस्सा भारत से टूटने का खतरा पैदा होता है। राष्ट्र की अखण्डता को संभाव्य इस खतरे की ओर ध्यान खींचने वाले प्रस्ताव यहाँ है।

पंजाब और कश्मीर
पाकिस्तान 1971 में टूटा। इसका अमरिका स्थित कुछ षक्ति केंद्रों को बड़ा सदमा हुआ। मानो अमरिका ही टूटा। उन्होंने बदले की भावना से अभिभूत होकर पाकिस्तान के कंधो पर बंदूक रखकर भारत को तोड़ने का बीड़ा उठाया। प्रथम पंजाब को तोड़ने के प्रयास हुए और बाद में कश्मीर को। पंजाब में तो सफलता नहीं मिली। किन्तु कश्मीर अभी भी धाधाक रहा है। आतंकवाद अभी भी वहाँ कायम है। इन दोनों विषयों पर संघ के प्रस्ताव हैं। पंजाब के बारे में प्रस्ताव व तद्नुसार व्यवहार के कारण पंजाब का आतंकवाद समाप्त हुआ। गलत रास्ते पर जाने वाले सिक्खों के कारण हिन्दु मानस चिढ़कर अपने ही सिक्ख बंधुओं के खिलाफ खड़ा नहीं हुआ। आतंकवादी भी सिक्ख समाज की सहानुभूति निरन्तर प्राप्त नहीं कर सकें। पंजाब बच गया। संघ के सबसे अधिक प्रस्ताव कश्मीर के बारे में हैं। धारा 370, कश्मीर को भारत तोड़ने की धारा हैं। अलगाववाद की जननी है, भ्रष्टाचार को पोषित करने वाली है, अत: उसको समाप्त करना चाहिये, यह राष्ट्रहित की बात कई प्रस्तावों द्वारा नि:संदिग्ध शब्दों में बतायी गई है। किन्तु वह धारा अभी भी कायम है। संघ का सबसे नूतन प्रस्ताव 2002 में पारित हुआ, जिसमें जम्मू-कश्मीर राज्य की पुनर्रचना की मांग का समर्थन किया गया है।

राष्ट्र की एकरसता के लिये
अपना स्वतंत्र राष्ट्र है। उसके शासन की सार्वभौमता अबाधित रहे इस हेतु अमरिका के साथ संभाव्य आणविक समझौते के खिलाफ चेतावनी दी गयी है। अपना राष्ट्र 'एकात्म और एकरस रहे, इस हेतु जो वर्ग सचमुच पिछड़े हैं, या छुआछूत जैसी बुरी रूढ़ि के शिकार हुये थे, उनको समान बिन्दु पर लाने के लिये आरक्षण की सुविधा शासन द्वारा दी गयी है। उसके खिलाफ कही-कही पर जन-आंदोलन भी हुये थे। संघ ने आरक्षण का समर्थन करने वाला प्रस्ताव 1981 में ही पारित किया था, जो आज भी सार्थक है। मुसलमान हो या ईसाई, उनको अपनी उपासना के लिये स्वतंत्रता रहे इसका संघ ने हमेशा समर्थन किया है। किन्तु व्यक्तिधर्म की स्वतंत्रता होते हुए भी समान समाजधर्म और राष्ट्रधर्म के पालन की आवश्यकता को भी संघ ने अधोरेखित किया है। समान नागरी संहिता का संघ पक्षधर है, यह बताने वाला एक प्रस्ताव है। मुसलमान और ईसाई अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने पर लगे हैं। संविधान की धारा 24 में, सभी मजहबों, सम्प्रदायों, पंथों, विश्वासों को आचरण और प्रसार का मौलिक अधिकार दिया गया है। किन्तु मुसलमान और ईसाई इस प्रावधान का दुरुपयोग कर, अपनी संख्या बढ़ाने के लिये प्रलोभन और आतंक का सहारा लेते हैं। स्वयं गलत काम करते हैं। उसके खिलाफ जनता में प्रतिक्रिया प्रकट हुई तो बिना छानबीन के संघ पर निरर्गल आरोप मढ़ देते हैं। इस अहितकारी गतिविधियों का निषेध करने वाले प्रस्ताव हैं। इस साजिश को रोकने के लिये, 1979 में श्री ओम प्रकाश त्यागी जी ने एक  प्रस्ताव संसद में रखा था। वह उनको वापस लेना पड़ा। किन्तु अब कई राज्यों की सरकारों को यह महसूस हुआ है कि धारा 24 का दुरूपयोग ईसाई मिशनरी कर रहें हैं। इन राज्यों ने  'धर्म स्वातंत्र्य' के गलत उपयोग के खिलाफ कानून किये हैं। मध्य-प्रदेश और उड़ीसा की कांग्रेस सरकारों ने इसके बारे में पहले से ही कानून किये हुये थे। उस सूचि में अब गुजरात, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश भी अंतर्भूत हो गये हैं। तमिलनाडु में भी यह कानून पारित हुआ था। किन्तु संकुचित राजनीतिक स्वार्थ के कारण उसी सरकार ने उसको निरस्त किया। इसमें विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि सन् 2004 में हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने भी यह कानून अभी-अभी पारित किया है। किन्तु आवश्यकता तो केन्द्र शासन में यह प्रस्ताव पारित करने की है, तथा उन्हीं पंथो, संप्रदायों और मजहबों को प्रचार और प्रसार की छूट रहे, जो अन्य पंथों, संप्रदायों, तथा विश्वासों के अस्तित्व को मान्यता देते हैं। इस हेतु संविधान में संशोधन की भी आवश्यकता है।
अपने देश को समृद्ध बनाने के लिये, तथा ग्रामीण जनता के विकास के लिये गोरक्षा आवश्यक है। पूरे देश में यह कानून होना चाहिये, इस संघ के आग्रह को प्रकट करनेवाले भी प्रस्ताव हैं। आर्थिक क्षेत्र में अपना देश आत्मनिर्भर रहे, इस हेतु स्वदेशी का आग्रह संघ द्वारा अनेकों बार प्रकट किया हुआ है। उसके सम्बन्ध में भी प्रस्ताव हैं।

मान बिन्दुओं की पुन: प्रतिष्ठा
प्रत्येक राष्ट्र का एक इतिहास होता है। भारत का भी गौरवपूर्ण प्राचीन इतिहास है। इस प्रदीर्घ इतिहास में, राष्ट्र के कुछ मानबिन्दु निश्चित हुए हैं। मानव जीवन के उदात्त मूल्य प्रस्थापित करने के लिये, अपने स्वार्थ के बलिदान द्वारा कीमत चुकाने वाले महापुरुष हुए हैं। ये सारे हमारे सांस्कृतिक आदर्श हैं। उनकी उपासना के लिये उनके मंदिर भी खड़े किये हैं। ये सारे मंदिर पवित्रता के प्रतीक हैं। शत्रु इन्हें नष्ट, भ्रष्ट करने पर तुले रहते हैं। पराजितों को और अपमानित करना यही उनका लक्ष्य रहता है। आठवी शताब्दी से पश्चिम की ओर से, इस्लाम के अनुयायी राष्ट्रों ने भारत पर जो आक्रमण किया, वे यहाँ के मानबिन्दुओं पर आघात करने से नहीं चूके। बाबर, औरंगजेब आदि अनेक मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं की भावनाओं पर चोट पहुँचाने के लिए ही, इन मानबिन्दुओं पर आघात किये। अयोध्या, काशी और मथुरा, ये भगवान् श्रीराम, भगवान् शिव और भगवान् श्रीकृष्ण की प्रतिमाओं से मंडित पवित्र स्थान हैं। दुष्ट आक्रान्ताओं ने उन पर आक्रमण कर उन्हें भ्रष्ट करने का जी तोड़ प्रयास किया। इनमें उनको सफलता भी मिली। उनके आक्रमण के और राष्ट्र के अपमान के प्रतीक अभी भी खड़े है। कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र ऐसे अपमान के प्रतीकों को बर्दाश्त नहीं करता। उनको उखाड़ कर फेंक देता है। किन्तु लज्जा की बात यह है कि भारत में ये अपमान के स्मारक अभी खड़े हैं। समाज के धुरंधर नेताओं को यह अपमान के प्रतीक चुभते नहीं, यह और भी शर्मनाक बात हैं। इन सब पवित्रतम् स्थानों के अपमान का कलंक धो डालने हेतु अनेक संस्थाए खड़ी हुई हैं। उनके शांतिपूर्ण आंदोलन भी चले हैं। अपने ही लोग इन आंदोलनों की उनको सांप्रदायिक कहकर निंदा करते हैं। रा.स्व.संघ, इन स्थानों की पुन: प्रतिष्ठा का पक्षधर है। रामजन्मभूमि को मुक्त करने के आंदोलन का वह प्रखर पक्षधर हैं। काशी और मथुरा की मुक्ति भी वह चाहता है। इन मानबिन्दुओं के अपमान चिन्हों को नष्ट कर उन्हें पुन: गौरवान्वित करने की उस की चाह को आविष्कृत करने वाले प्रस्ताव भी यहाँ है।
सभी विषयों का परामर्श तो प्रस्तावना में नहीं लिया जा सकता, न ही उसकी आवश्यकता है। संक्षेप में इतना ही बताया जा सकता है कि ये सारे प्रस्ताव राष्ट्र की आत्मा की वेदना उसकी चाह तथा उसका स्वाभिमान प्रकट करने वाली सच्ची राष्ट्रभक्ति की जो भावना होती है, उसका आविष्कार करते हैं। संघ को समझना यानि राष्ट्रभक्ति की भावना को समझना है। इस हेतु इन प्रस्तावों का वाचन, अध्ययन और मनन सभी के लिये उपयुक्त रहेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

नागपुर                                

मा.गो.वैद्य
14-02-07